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Saturday, 18 June 2011

पासपोर्ट का रंग: प्रवासी की व्यथा-कथा

तेजेंद्र शर्मा की कहानी ‘पासपोर्ट का रंग’ एक ऐसे व्यक्ति की मार्मिक कहानी है जिसे मजबूरी में ब्रिटेन की नागरिकता लेनी पड़ी है। यह पीढियों की सोच और उनके मूल्यों के बीच की खाई को प्रदर्शित करने वाली कहानी है। जहाँ पुरानी पीढ़ी अतीत से अपने अनुभव निकाल कर वर्तमान को उन्हीं के आधार पर तौलती-परखती है, वहीं नई पीढ़ी वर्तमान को अपना सब कुछ माने बैठी है। उसके लिए जीवन की बेहतर सुख-सुविधा अधिक मायने रखती है। उसकी सोच में प्रगति की झलक है। अतीत में जो हुआ वह बीत चुका है उसे बदला नहीं जा सकता है और उसी का रोना रोते रहने से प्रगति नहीं होगी यह वह अच्छी तरह से जानता है। उसने भी स्वतंत्रता का मोल चुकाया है मगर वह पुरानी पीढ़ी से भिन्न है। भारतीय पुरानी पीढ़ी ने स्वतंत्रता के लिए आंदोलन किया और उसके लिए सजा पाई, गोली खाई। और जब आजादी मिली तो टुकड़ों में तथा उसकी कीमत भी उसे चुकानी पड़ी। उसे विस्थापन भोगना पड़ा। वह घर से बेघर हो गया। अपने ही देश में पराया हो गया क्योंकि बँटवारे की आग ने आदमी को हैवान बना दिया था। “गोपाल दास के लिए लाहौर से दिल्ली आना मजबूरी थी। अपनी जन्मभूमि को छोड़ना उस समय उन्हें बहुत परेशान कर रहा था। किंतु कोई चारा नहीं था। वहाँ किसी पर विश्वास नहीं बचा था। दोस्त दोस्त को मार रहे थे। हर आदमी या तो हिन्दु बन गया था या फ़िर मुसलमान। रिश्ते जैसे खत्म ही हो गए थे। सभी इंसान धार्मिक हो गए थे और जानवर की तरह बर्ताव कर रहे थे।” कहानीकार ने यहाँ धार्मिक के साथ जानवर शब्द का प्रयोग विशेषण विपर्यय के रूप में किया है। जिससे उस काल के उन्माद का पता चलता है।

बहरआल गोपालदास जी के जीवन की विडंबना है कि उन्हें एक बार फ़िर से दर-ब-दर होना पड़ा है। पत्नी के गुजरने के बाद उन्हें उनका बेटा इंद्रेश अपने पास इंग्लैंड ले आया है। बेटी शादी के बाद अमेरिका में है। आज भारत के अधिकाँश माता-पिता की यही स्थिति है। बच्चे बेहतर अवसरों की तलाश में प्रवासी हो गए हैं और वृद्ध माता-पिता उनके लिए आँखें बिछाए देश में ही प्रतीक्षा पर रहे हैं अथवा मजबूरी में अपने बच्चों के साथ विदेश में लतके हुए हैं। जहाँ न उनके विचार मिलते हैं न मूल्य और न ही जीवन शैली। एक दुनिया: समानांतर में राजेन्द्र यादव कहते हैं, कहानी का कोई भी पात्र अपने आपमें कुछ नहीं होता है, किसी-न-किसी का प्रतीक होता है। गोपाल दास प्रतीक हैं उन सारे लोगों के जिन्हें मजबूरी में किसी अन्य देश की नागरिकता लेनी पड़ती है। जिनके लिए यह मजबूरी उनके सीने पर बोझ बन जाती है। वे आम आदमी का प्रतीक हैं।

स्वतंत्रता की कीमत युवाओं ने भी अदा की है। अपेक्षा थी कि भारत एक बार अंग्रेजों की गुलामी से छूट जाएगा तो देश में खुशहाली होगी। सबका जीवन सुखी होगा। लोगों ने स्वतंत्र भारत के बहुत सुहावने स्वप्न देखे थे। मगर जल्द ही उनका मोहभंग हो गया। अत: जिससे भी जैसे भी बन पड़ा बेहतर भविष्य की तलाश में प्रवास पर निकल पड़ा। हाँ, इसको युवा पीढ़ी ने मजबूरी के तौर पर नहीं लिया और जहाँ गए वहाँ के जीवन को अपनाने का प्रयास करने लगे। इसके लिए उन्हें जो भी समझौते करने पड़े उन्होंने उसे सहजता से जीवन की परिहार्यता मान कर स्वीकारा। उन्हें परदेश से ज्यादा शिकायतें न थीं। जरूरत पड़ी तो प्रवास देश की नागरिकता ग्रहण करके वहीं बस गए। पुरानी पीढ़ी की बातें नई पीढ़ी को भावुकता लगती है। साहित्यकार तथा आलोचक अजय नावरिया इस कहानी पर लिखते हुए कहते हैं कि वर्तमान समय में भावुकता के लिए कम-से-कम दया और ज्यादा-से-ज्यादा खीज है। यही खीज बेटे इंद्रेश की बातों में सुनाई देती है। बहु सरोज के मन में अपने स्वसुर के लिए दया है। मगर गोपालदास जैसे लोगों के लिए यह मजबूरी है। जिस ब्रिटिश साम्राज्य को निकाल भगाने के लिए उन्होंने अपनी बाँह में गोली खाई उसी ब्रिटिश नागरिकता के लिए उन्हें महारानी की वफ़ादारी की शपथ उन्हें लेनी पड़ती है। वे शपथ ले तो लेते हैं मगर यह उनकी मानसिक व्यथा का कारण बन जाता है। वे खुद को धिक्कारते हैं। यह आघात उनके मर्म पर लगा है। उनका खाना-पीना सब छूट जाता है।

गोपलदास का चरित्र निर्माण करने के विषय में स्वयं तेजेन्द्र शर्मा का कहना है, “ बाऊजी की यह छवि मेरी बहुत सी कहानियों में दिखाई देती है। ‘पासपोर्ट के रंग’ कहानी के बाऊजी का पूरा चरित्र मैंने अपने बाऊजी पर आधारित किया है जबकि मेरे बाऊजी मेरे ब्रिटेन प्रवास करने से बहुत पहले ही स्वर्गवासी हो गए थे।” पाठक के मन में सहज जिज्ञासा उठती है कि कैसे थे तेजेन्द्र शर्मा के पिता, तेजेन्द्र खुलासा करते हैं, “बाऊजी की खासियत ही उनकी कमजोरी भी थी। बाऊजी जरूरत से ज्यादा ईमानदार व्यक्ति थे। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उनकी बाई बाजू में गोली लग गई थी। पाठक देखता है कि यही गोली गोपालदास को भी लगी है।

बेटे की सोच आधुनिक है, वह अधिक व्यावहारिक है। अंग्रेजों ने जो जुल्म भारतीयों पर किए थे उसी को याद करके जीवन को वहीं ठहराए रहने के पक्ष में इंद्रेश नहीं है। पुरानी बातें भूल कर बेटा जब लाइफ़ आगे बढ़ाने की बात कहता है तो पिता का कहना है, “ – बेटा तू नहीं समझ सकता। मेरे लिए ब्रिटेन की नागरिकता लेने से मर जाना कहें बेहतर है। मैंने अपनी सारी जवानी इन गोरे साहबों से लड़ने में बिता दी।...जेल में रहा। मुझे तो फ़ाँसी की सजा तक हो गई थी।” जहाँ पिता के मन में द्वंद्व है, वहीं बेटे के मन में कोई द्वंद्व नहीं है। हाँ, पिता को लेकर वह जरूर चिन्तित है। दोनों अपनी-अपनी जगह सही हैं। दोनों के अनुभव भिन्न हैं जीवन का नजरिया भिन्न है। बेटा दूसरी दुनिया में रह रहा है, उसने नए जीवन को सहजता से स्वीकार कर लिया है। उसे ब्रिटिश पासपोर्ट की मात्र अच्छाइयाँ नजर आ रही हैं वह कहता है कि ब्रिटिश पासपोर्ट हो तो वीजा की जरूरत नहीं होती है। मजे से जब चाहो हवाई टिकट लो और किसी भी देश में घूँम आओ। शायद उसके मन में घूँमने-फ़िरने के लिए मौज मस्ती के लिए यूरोप और अमेरिका के तमाम देश हैं। मगर भारत नहीं है, क्योंकि वह भूल जाता है कि भारत आने के लिए वीजा की आवश्यकता पड़ती है। यह बात गोपालदास कैसे भूलते उन्हें तो केवल और केवल भारत आना है। वे भारत लौटने के लिए विझुब्ध हैं। उन्हें यह बात कचोटती है कि अपनी जन्मभूमि के लिए उन्हें वीजा लेना होगा। उन्हें जब इसकी कोई सूरत नहीं नजर आती है तो वे कामना करते हैं कि कोई ऐसी जुगत हो कि दोनों देशों की नागरिकता मिल जाए।

बिल्ली के भागों झींका टूटा। उनकी कामना में अवश्य बल रहा होगा, गोपालदास स्टार टीवी और ज़ी टीवी पर भारत की खबरें सुनते रहते थे। भारत के बारे में भारतवासियों से अधिक गोपालदास जी को खबर रहती। और एक दिन कमाल हो गया, प्रवासी दिवस पर प्रधानमंत्री ने दोहरी नागरिकता की घोषणा कर दी। गोपालदास की खुशी का अंदाजा लगाया जा सकता है। आम आदमी को सत्ताधारी लोग ऐसे ही छोटे-छोटे झुनझुने थमाते रहते हैं जिनसे आम आदमी खुश होकर तमाम उम्मीदें पाल लेता है। पहले पाँच देशों के प्रवासियों के लिए दोहरी नागरिकता की घोषणा होती है, शुक्र है ब्रिटेन उनमें से एक है। गोपालदास जी के पैर जमीन पर नहीं पड़ रहे हैं। वे आनन-फ़ानन में दोहरी नागरिका लेकर फ़िर से भारत के नागरिक बन जाने के स्वप्न पालने लगते हैं। मगर घोषणाओं को इतनी जल्दी अमली जामा नहीं पहनाया जाता है। बीच में लालफ़ीताशाही भी होती है। एक्ट बनने की लम्बी प्रक्रिया तो होती ही है।

वे उस पीढ़ी के हैं जिसका केवल काँग्रेस पर पहले बड़ा भरोसा था मगर अब काँग्रेस से जिनका भरोसा उठ चुका है। वे कहते हैं, “यार ये कोई काँग्रेसी प्रधानमंत्री नहीं है। यह करेक्टर वाला बंदा है।” मगर समय के साथ-साथ गोपालदास जी का धैर्य चुकने लगता है। अगले प्रवासी दिवस पर वे वीजा लेकर भारत आ जाते हैं, सोचते हैं प्रवासी दिवस में खुद भाग लेकर स्थिति का सही जायजा लेंगे। उन्हें एक और झटका लगता है। प्रवासी दिवस में भाग लेने के लिए तगड़ी फ़ीस लगती है। ऐसा नहीं है कि वे यह फ़ीस नहीं भर सकते हैं मगर यह उन्हें अपमानजनक लगता है। यह बात उन्हें और भी ज्यादा खटकती है कि सारा कार्यक्रम अंग्रेजी में होता है। असल में प्रवासी दिवस उन जैसे आम लोगों के लिए नहीं है वह तो संमृद्ध, व्यवसायी प्रवासियों को देश में पूँजी लगाने के लिए आमंत्रित करने का आयोजन है। आज भारत सरकार और सत्ता संस्थान प्रवासियों को सम्मान दे रहे हैं, परंतु यह आर्थिक कारणों से अधिक हो रहा है। बात आर्थिक मुद्दों पर ही समाप्त हो जाती है। दोहरी नागरिकता का प्रवधान धनी-मानी प्रवासियों को ध्यान में रखकर बनाया गया है। इससे तमाम गरीब प्रवासी जो विभिन्न देशों में बद्तर हालत में रह रहे हैं मेहनत मजदूरी करके किसी तरह अपना पेट पाल रहे हैं, अपना पेट काट कर थोड़ी बहुत रकम अपने घर वालों की सहायता के लिए भेज पाते हैं उनका कोई भला करने के लिए यह या ऐसी कोई भी योजना किसी भी पार्टी की सरकार नहीं बनाती है। उसके एजेंडे पर गरीब-मजबूर प्रवासी नहीं होता है। सरकार और प्रकाशकों का यही नजरिया रचनाकारों के प्रति भी कमोबेश यही है। चूँकि अंग्रेजी रचनाकारों का बाजार है अत: उनकी पूछ है, हिन्दी का लेखक उसका पुअर कजिन है जिसकी ओर कोई ध्यान नहीं देना चाहता है न ही सरकार और न ही प्रकाशक। पासपोर्ट का रंग में लेखक बिना बड़बोलेपन के ये बातें चुपचाप कहानी में इंगित कर देता है।

कहानी तब प्रारंभ होती है जब पासपोर्ट और वीसा के नियम आज से भिन्न थे। कहानी की समाप्ति तक नियमों में काफ़ी बदलाव आ चुका होता है। इस दृष्टि से यह कहानी अपने छोटे कलेवर में एक बड़ी कहानी है। संवेदना और अनुभूति के स्तर पर इसमें सघनता और गहराई दोनों हैं। इस कहानी की वास्तविकता के बारे में चाहे कुछ भी कहा जाए, यह अपने सच होने का पूरा-पूरा अहसास उत्पन्न करती है। रचनाकार जिस भूखंड और समाज से परिचित है उसने उसे ही कहानी का घटना स्थल बनाया है। गौरतलब है कि तेजेन्द्र शर्मा भारत में रहते हुए भी कहानियाँ लिख रहे थे। वे ११ दिसम्बर १९९८ से लंदन में रह रहे हैं और उन्होंने ब्रिटेन की नागरिकता भी ले ली है। इसलिए लेखक के रूप में वे भारत और लंदन दोनों भूखंड़ों और समाज से परिचित हैं। लंदन में अक्सर बहुत से भारतीय अपने-अपने समाजों में ही सिमटे रहते हैं जैसे गुजराती, पंजाबी, हिन्दु, मुसलमान। मगर तेजेन्द्र के अनुसार उनकी मित्र मंडली में हिंदु-मुसलमान तो हैं ही कई अंग्रेज भी हैं। एक साक्षात्कार में वे बताते हैं, “हां, भारतीय लोग जरूर खेमों में बंटे हुए हैं। कोई गुजराती है तो कोई पंजाबी, कोई हिन्दु है तो कोई मुसलमान! मेरे दोस्तों में अंग्रेज भी हैं, काले भी हैं और दक्षिण एशियाई मूल के लोग भी हैं। लंदन के कॉलिडेल क्षेत्र की काउंसलर श्रीमती ज़कीया ज़ुबेरी से उनकी दोस्ती जग-जाहिर है। वे उनके व्यक्तित्व से खासे प्रभावित हैं यह वे स्वयं स्वीकार करते हैं। दोनों मिल कर हिन्दी-उर्दू के प्रसार-प्रचार के लिए कई कार्यक्रम चलाते हैं। वे साफ़ तौर पर स्वीकार करते हैं, “ज़किया जी की दुनिया से हुए परिचय ने ही ‘एक बार फ़िर होली’, ‘कब्र का मुनाफ़ा’, ‘तरकीब’, ‘होमलेस’ जैसी कहानियाँ लिखने की प्रेरणा दी। कई चर्चित और बेहतरीन कहानियाँ लिखी हैं।”

‘पासपोर्ट’ कहानी पर एक बार पुन: लौटें। कहानी में अगले प्रवासी दिवस पर प्रधानमंत्री ने दोहरी नागरिकता के लिए देशों की संख्या बढ़ा अब वह पाँच से बढ़ कर सोलह देशों के भारतीय प्रवासियों के लिए घोषित की जा चुकी थी। गोपालदास जी प्रधानमंत्री से मिलने का प्रयास करते हैं लेकिन प्रजातंत्र के प्रधानमंत्री से मिलना कोई हँसी-खेल नहीं है। खूब भागदौड़ कार्ने के बाद वे अपने नए देश लौट आते हैं। प्रजातंत्र की विशेषता है कि इसके सत्ता समीकरण बदलते रहते हैं कब और कितने दिन कौन-सी पार्टी सत्ता में रहेगी बताना मुश्किल है। सरकार बदलते ही पुरानी सरकार द्वारा किए सारे वायदे झाड़-बुहार कर बाहर कर दिए जाते हैं और नए वायदों की घोषणा होने लगती है। भारत की सरकार भी बदल गई। काँग्रेस पुन: सत्ता पर काबिज हो गई। गोपालदास जी मन को दिलासा देते हैं कि इस बार काँग्रेस है तो क्या हुआ प्रधानमंत्री तो एक खालसा है। “खालसा को प्रधानमंत्री के रूप में देख कर गोपाल दास जी के मन में उम्मीद और गहरी बँधने लगी थी। गुरु साहब ने खालसा बनाया ही इसलिए था कि हमारी रक्षा कर सके।” गोपाल दास जी कुछ दिन और रुक जाते तो देखते कि खालसा कैसा कठपुतली है। वे तर्क के आधार पर व्यक्ति को उतना नहीं परखते हैं जितना कि उसके धर्म, आस्था, पार्टी, मिथकीय कथाओं के आधार पर परखते हैं। उनके लिए व्यक्ति से ज्यादा उसका धर्म, उसकी कौम महत्वपूर्ण है। साथ ही वे अपने अनुभवों का सहारा लेते हैं जो एक तरह से उचित है। मगर वे अपने अनुभवों का साधारणीकरण करते हैं और जीवन तथा परिस्थितियों को उसी चश्मे से देखते हैं। जबकि सामान्यीकरण अक्सर गलत नतीजे देता है। ये सब पर लागू नहीं हो सकते हैं।

गोपालदास जी के जीवन की सूई एक ही स्थान – दोहरी नागरिका – पर रुक गई। वे अब दिन रात यही सोचते-बोलते। कितना सुनते लोग। परिवार चिंतित है मगर बाहर के लोग, दोस्त उन्हें पागल करार देने लगे। इसी बीच खबर आई कि प्रवास मंत्रालय बन गया है और प्रवास मंत्री अपने हाथों से ऑस्ट्रेलिया में दोहरी नागरिकता के फ़ॉर्म बाँट रहे हैं। समाचारों पर से उनका विश्वास उठ गया था अत: उस दिन घर लाकर अखबार खूब ध्यान से पढ़ते हैं। यहाँ मीडिया के बढ़ा-चढ़ा कर खबर को प्रदर्शित करने पर तेजेंद्र कटाक्ष के रूप में प्रस्तुत करते हैं। आम आदमी भी मीडिया की विश्वसनीयता को लेकर सशंकित है। इस बार खबर सच्ची थी। गोपालदास जी को तसल्ली होती है, “अब मेरा अशोक के शेर वाला नीला पासपोर्ट एक बार फ़िर से जीवित हो उठेगा। केवल पासपोर्ट का रंग नीले से लाल होने पर इंसान के भीतर कितनी जद्दोजहद शुरु हो जाती है।” वे निरंतर आशा-निराशा के झूले में झूल रहे हैं।

किसी तरह बेचैनी में रात कटती है, अगली सुबह वे सीधे भारतीय उच्चायोग के दरवाजे पर थे। मगर वहाँ इस तरह की कोई सुनगुन न थी। ऑफ़िस में दोहरी नागरिकता के लिए कोई फ़ॉर्म उपलब्ध न था। वे इसे अफ़सरशाही की चाल सोचते हैं। उन्हें लगता है कि इन लोगों को सरकार से अपनी कोई माँग मनवानी होगी इसीलिए ये लोग काम रोके हुए हैं। अकसर प्रजातंत्र में सरकार से अपनी माँग मनवाने का तरीका असहयोग है। अब तक गोपालदास जी का धैर्य जवाब दे चुका था। उनका अनुभव करता था कि अफ़सरशाही हमेशा ही आम आदमी की राह में रुकावटें पैदा करती रहती है। वे ऑफ़िस के लोगों से लड़ पड़े। बात इतनी बढ़ गई कि सुरक्षा कर्मचारी उन्हें बाहर निकालने आ गए तभी एक परिचित ने उन्हें बचाया और घर जाने की सलाह दी। वे आहत मन घर की ओर चलते हैं रास्ते में उन्हें तरह-तरह के विचार परेशान करते हैं। वे खुद को इतना परेशान, लाचार और बेबस अनुभव करते हैं कि उनके मन में आत्महत्या का विचार आता है। किसी तरह वे घर पहुँचते हैं। उनके मन में इतनी ग्लानि, हताशा है कि उनका चेहरा बहु सरोज को देश कर और सकपका जाता है उन्हें लगता है कि कहीं सरोज को ऑफ़िस में हुई अपमान जनक स्थिति का पता चल गया तो क्या होगा। वे अपनी ही निगाह में गिर जाते हैं, उनका आत्मसम्मान भहरा चुका है। वे सरोज की लाई चाय पीकर अपने कमरे में चले जाते हैं।

बेटा इंद्रेश जब काम से लौटता है तो सरोज को बताता है, “सरोज, बाऊजी की तबियत शायद ज्यादा बिगड़ती जा रही है। आज हाई कमीशन में जाकर नाटक कर आए हैं। त्रिलोक का फ़ोन आया था मुझे।” बेटे को ऑफ़िस में हुई अप्रिय घटना की सूचना मिल गई है। मगर उसने भी पिता को पागल सोच-समझ लिया है वह पागल शब्द का प्रयोग नहीं करता है मगर बीमारी से उसका स्पष्ट तात्पर्य पागलपन से ही है। पिता ने जो किया वह उसे उनका जायज काम नहीं लगता है, उसे नहीं लगता है कि कोई मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति ऐसा काम कर सकता है इसीलिए पिता का काम उसे नाटक लगता है। सरोज ज्यादा संवेदनशील है वह पहले भी इंद्रेश से कहती है, “जब बाऊजी को पसंद नहीं तो क्यों उनकी नागरिकता बदलवाई जाए। लेकिन इंद्रेश ने किसी की नहीं सुनी।” आज भी वह कहती है, “देखिए आज कुछ कहिएगा मत। हाई कमीशन से बहुत परेशान लौटे हैं। मुझे पता नहीं था कि वहाँ गए थे। लेकिन चेहरा देख कर मुझे लगा कि बहुत निराश दिखाई दे रहे हैं। आप कल समझा दीजिएगा। डिनर टेबल पर कुछ मत कहिएगा।”

पाठक सोचता है कि अब बाप बेटे में कुछ बाता-बाती होगी, बेटा अपने अपमान की बात कहेगा, पिता अपने आहत मन को खोलेगा। मगर जब पोती बाबा को खाना खाने के लिए बुलाने के लिए उनके कमरे में जाती है तो वहाँ कोई और ही दृश्य उपस्थित है। जो पाठक की अपेक्षा से बिल्कुल अलग है। “गोपालदास जी एकटक छत को देखे जा रहे थे। उनके दाएँ हाथ में लाल रंग का ब्रिटिश पासपोर्ट था और बाएँ हाथ में नीले रंग का भारतीय पासपोर्ट। उन्होंने ऐसे देश की नागरिकता ले ली थी जहाँ के लिए इन दोनों पासपोर्टों की जरूरत नहीं थी।” उन्होंने ऐसे देश की नागरिकता ले ली थी जहाँ के लिए इन दोनों पासपोर्टों की जरूरत नहीं थी।’ यदि यह वाक्य कहानीकार खुद न लिख कर पाठकों और आलोचकों पर छोड़ देता तो कहानी और सुगठित, सारगर्भित बनती। खैर।

कहानी का अंतिम वाक्य समय, समाज और सत्ता की विडंबना पर एक सटीक वाक्य है। इधर गोपालदास की मृत्यु की बात परिवार को ज्ञात होती है, उधर “स्टार न्यूज पर पगड़ी पहने नए प्रधानमंत्री अपनी मूँछों में मंद-मंद मुस्कुराते हुए घोषणा कर रहे थे कि अब विदेश में बसे सभी भारतीयों को दोहरी नागरिकता प्रदान की जाएगी।” तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री की बड़ी सटीक तस्वीर खींची है लेखक ने।

प्रवासी रचनाकारों पर अक्सर आरोप लगता रहता है कि वे भावुकता की, नॉस्टल्जिया की कहानियाँ लिखते हैं। भारत का गुणगान ही उनका मुख्य विषय होता है। वे रहते विदेश में हैं पर बातें सदा भारत में स्वर्णिम जीवन की करते हैं। उन्हें दूर रह कर यहाँ का सब कुछ बहुत अच्छे रूप में याद आता है। उनकी कहानियों में वहाँ का समाज, वहाँ का जीवन भारत के जीवन को और अच्छा, और महान दिखाने के लिए पृष्ठभूमि के रूप में ही अधिकतर आता है, जैसे सुनार स्वर्णाभूषण प्रदर्शित करने के लिए गहरे रंग के मखमल का प्रयोग करता है ताकि आभूषण खिल कर दिखाई दे। विदेश में सब कुछ बुरा ही है तब मन में प्रश्न उठता है कि ये वहाँ गए ही क्यों जबकि ये मनमर्जी से गए हैं किसी मजबूरी में बँधुआ बन कर नहीं। यह आरोप काफ़ी हद तक कुछ प्रवासी कहानीकारों के विषय में सही भी हैं। मगर सबको एक ही लाठी से नहीं हाँका जा सकता है। तेजेन्द्र ने लंदन में मुहिम चला रखी है। एक साक्षात्कार में वे कहते हैं, “मैंने एक मुहिम शुरु की कि हिन्दी कथाकारों को अपने साहित्य में ब्रिटेन के सरोकार लाने होंगे। मैंने ब्रिटेन में बसे भारतीयों के जीवन को समझने का प्रयास किया है। यहाँ के श्वेत लोगों से दोस्तियाँ शुरु की ताकि उनके जीवन को समझने का मौका मिल सके। अंग्रेजों के घर को भीतर से देखा। उनके दिल में झाँकने की कोशिश की।”

कहानी के विषय में अजय नावरिया का कहना है कि ‘पासपोर्ट का रंग’ कहानी तेजेन्द्र शर्मा के राजनैतिक दृष्टिकोण का भी परिचय देती है। वे कहते हैं, “इस दृष्टि में एक स्पष्टता है कि राजनीति वित्त प्रेरित और स्वार्थ आधारित है। इसमें कोई दलीय विचारधारा विरोध नहीं रखती।” आज प्रवास के नियम बदल चुके हैं। संचार और यातायात के संसाधनों में भी नित नए परिवर्तन हो रहे हैं। ऐसे समय में प्रश्न उठता है कि भविष्य में इस कहानी का क्या महत्व होगा? तो जरा ध्यान दिया जाए तो देखा जा सकता है कि इस कहानी का ऐतिहासिक तथ्यों को दर्ज करने केलिए सदा-सदा महत्व रहेगा। यह कहानी एक ऐसे कथानक पर आधारित है जो दिखाती है कि एक समय था जब प्रवास के नियम भिन्न थे और उन नियमों का आम आदमी के जीवन पर दारुण प्रभाव पढ़ता था। इसकी संवेदनशीलता पाठक को सदैव विचलित करेगी, उसे प्रवासी के दु:ख-दर्द में भागीदार बनाएगी। तेजेन्द्र शर्मा की कथन की रवानगी और छोटे-छोटे मगर सारगर्भित संवाद कहानी को प्रभावशाली बनाते हैं। कहानी पाठक पर एक विशिष्ट छाप छोड़ती है।

यमुनानगर में इस कहानी पर आधारित नाटक देखना अपने आप में एक भिन्न अनुभव था। डी ए वी कॉलेज की छात्राओं ने भाव प्रवण अभिनय से कहानी को जीवंत कर दिया था।
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Wednesday, 4 May 2011

डा. अचला शर्मा का कथा संसार

कहानी का परिदृश्य में राजेन्द्र यादव कहते हैं, “विशिष्ट रचना हमेशा अपने कथ्य और अनुभव क्षेत्र में कुछ नया जोड़ती है.”

डा. अचला शर्मा की कहानियाँ इस अर्थ में विशिष्ट हैं क्योंकि उनका कथ्य तथा अनुभव क्षेत्र हिन्दी कहानी को समृद्ध करता है और उसे एक नई दुनिया, प्रवासी दुनिया से जोड़ता है. उनका रचना संसार बहुत गहन और विस्तृत है. गहन इस अर्थ में कि वे पात्रों के मन की गहराइयों में उतर कर उनके मन में चल रही उथल-पुथल का बहुत गहनता से अध्ययन करती हैं. मानवीय संबंधों के बीच के तनाव को बड़ी शिद्दत के साथ पाठकों तक संप्रेषित करती हैं. संवेदना के साथ अपनी कहानियाँ रचती हैं. विस्तृत इस अर्थ में कि वे एक विहंगम दृश्य रचती हैं. उनकी व्यापक दृष्टि मनुष्य मात्र पर है. भौगोलिक रूप से कहानियों का विस्तार भारत और इंग्लैंड के साथ कई अन्य देशों को भी अपने आप में समेटे हुए हैं. वे इंग्लैंड में रहती हैं सो इंग्लैंड तो यहाँ है ही, भारत का उनकी कहानियों में आना स्वाभाविक है. इसके साथ-साथ उनके यहाँ पाकिस्तान, स्कॉटलैंड और जिनेवा भी नजर आता है. उनकी दुनिया इंग्लैंड प्रवासी की अनुभवजन्य और अनुभूतिप्रसूत दुनिया है. जिनसे गुजरते हुए हिन्दी का आम पाठक दूर-दराज की जीवन शैली से परिचित होता है. वहाँ की सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों को जानने समझने का अवसर पाता है. प्रवासी के मन में चल रही उथल पुथल, उसकी चिन्ता, सोच समझ को महसूस करने का मौका पाठक को मिलता है. उनके यहाँ प्रवासी की निरी भावुकता नहीं है. वे भूमंडलीकरण के दौर के समय और समाज को तटस्थता के साथ प्रस्तुत करती हैं. इंग्लैंड के साथ अपने मूल देश भारत और उसके पड़ोसी देश पाकिस्तान पर खासतौर से उनकी दृष्टि है. वैसे भी जब आप दूर से देखते हैं तो नजरिया व्यापक और वस्तुनिष्ठ हो जाता है. स्वयं उनका कहना है, “प्रवास सिर्फ़ नॉस्टेल्जिया का पर्याय नहीं है. प्रवास लेखक को अपने देश के सामाजिक-राजनीतिक बदलावों को देखने और समझने की तटस्थ दृष्टि भी देता है.” वे मानवीय संबंधों के पार जाकर मानवीय संवेदना का चित्रण करती हैं.

उन्होंने “रेसिस्ट” * कहानी में पाकिस्तान और पाकिस्तानियों को एक देश और मनुष्य के रूप में चित्रित किया है, आतंकवादी के रूप में नहीं. उनके लिए मानवीय मूल्य सर्वोपरि हैं. वे आज के मुद्दों पर कहानी रचती हैं. रेसिस्ट आतंकवाद का क्रूर, कुफ़ल भुगत रहे सामान्य आदमी के भय का चेहरा दिखाने वाली कहानी है. जबकि “मेहरचंद की दुआ” गैरकानूनी ढ़ंग से प्रवास कर रहे व्यक्ति की ऊहापोह से पाठक को परिचित कराती है. महरेआलम अपनी समस्त जमापूँजी दाँव पर लगा कर बेहतर जिन्दगी की तलाश में छ: महीने का टूरिस्ट वीजा लेकर लंदन आया था और छ: महीने पार होने के बाद गुमनामी की जिन्दगी बिता रहा है. “अब वह इस मुल्क में है भी, और नहीं भी... बिना वजूद के एक बेनाम जिन्दगी बसर कर रहा है...खौफ़ हमेशा बना रहता है कि किसी ने खबर कर दी तो पकड़ कर वापस भेज देंगे.” सारी कमाई जेब में जाती है टैक्स नहीं देना पड़ता है. मगर “इस बात से डरता रहा है कि कहीं बीमार पड़ गया और किसी अस्पताल में जाना पड़ा तो सारी पोल खुल जाएगी...किसी झगड़े में नहीं पड़ता. बस अपने काम से काम रखता है.” इस पर भी उसे जिल्लत का अनुभव होता है, वर्ल्ड सेंटर गिरने के बाद उसके सामने अक्सर मुसलमान कौम और पाकिस्तान को गालियाँ दी जाती हैं. और “जब लंदन के अन्डरग्राउंड में बम फ़टे थे तो आए दिन कोई न कोई मुसलमानों की ऐसी तैसी करता था.” यहाँ तक कि उस पर कटाक्ष करते हुए कहा जाता है, “मुसलमान अगर हिन्दू का भेस बदल कर आ जाए तब भी उस पर भरोसा नहीं करना चाहिए.” वह कट कर रह जाता है. खून का घूँट पी कर भी चुप रहता है. वह कहना चाहता है, “न सारे मुसलमान दहशतगर्द हैं और न ही सारे दहशतगर्द पाकिस्तानी.” मजबूरी में वह नवीन भाई की दुकान पर मेहरचन्द के नाम से नाई का अपना पुश्तैनी काम कर रहा है. कहानीकार ने प्रवास और उसके अन्तर्द्वन्द्व को समझने की कोशिश की है. आम इंसान के लिए दो शाम की रोटी का इंतजाम ही उसका दीन ईमान है “बाकी सब अल्लाह मियाँ जाने.”

वातावरण का मतलब है रचनाकर का अनुभव जगत. जिसमें भौतिक परिवेश का प्रमुख हाथ होता है. मौसम, युद्ध-शान्ति, धर्म, आर्थिक दबाव लेखक की सृजनात्मकता को आकार देने वाले कारक होते हैं. वातावरण का प्रभाव तात्कालिक होता है. “रेसिस्ट” में धर्म और आतंकवाद जैसे तात्कालिक कारक तनाव की सृष्टि करते हैं. आर्थिक दबाव के कारण महरेआलम/मेहरचंद का सृजन हुआ है और भौतिक परिवेश का एक प्रमुख कारक मौसम कहानीकार को “चौथी ऋतु” जैसी अनोखी कहानी की रचना के लिए प्रेरित करता है.

अपनी प्रिय कहानी “चौथी ऋतु” में वे आज के व्यस्त जीवन में बुजुर्गों की स्थिति का जायजा लेती है. यह प्रवासी लेखक द्वारा लिखी जाकर भी प्रवासी कहानी न होकर प्रवासी अनुभवप्रसूत कहानी है. इस कहानी का परिवेश तो विदेशी है ही सारे पात्र, उनकी संवेदनाएँ, सभ्यता-संस्कृति, मूल्य व्यवहार सब विदेशी हैं. जीवन और वृद्धावस्था को देखने का उनका दृष्टिकोण भी विदेशी है. “जैसे जैसे बुढ़ापे की पदचाप सुनाई पड़ने लगती है, चुनने की आजादी खतम होने लगती है. रह जाती है एक संकरी गली – वह भी आगे से बंद.” सुखी जीवन व्यतीत करने के बावजूद लिंडा, पीटर, रोज़मेरी और लॉरेंस आज एकाकी जीवन जीने को अभिशप्त हैं. एक कटु सच्चाई जो आज भारत में भी जड़ जमा रही है. क्रिसमस का त्योहार है. लंदन में तीस साल में इतनी बर्फ़ पहली बार गिरी है. सब कुछ जम गया है. रिश्ते भी. कहानीकार इस कहानी के संबंध में अपने वक्तव्य में कहती हैं, “क्रिसमस के महीने को झेलने के लिए जरूरी है कि आप जवान और तंदुरुस्त हों, आपका बड़ा सा परिवार हो या बहुत सारे दोस्त हों.” कहानी के सारे पात्र बूढ़े और एकाकी हैं. कहानीकार का कमाल है कि इस सर्द मौसम में भी वह अजनबियों के बीच रिश्तों की गरमाहट पैदा करती है. मौत के साए को दूर हटा कर जिन्दगी को खुशहाल बनाती है. यह कहानी इस मिथक को खारिज करती है कि प्रवासी कहानियाँ मात्र गृहातुरता का राग हैं. यह दिखाती है कि अचला शर्मा की सजग व्यापक दृष्टि सूक्ष्मता से अवलोकन करती है और देशकाल के पार जाकर अपने कथ्य को प्रस्तुत करती है. इसी कारण वे एक विशिष्ट कहानीकार की श्रेणी में रखे जाने की हकदार हैं. एक संवेदनशील रचनाकार होने के नाते उनके लिए देशकाल से ज्यादा मायने रखती हैं मानवीय अनुभूतियाँ.

“दिल में कस्बा” पीढियों तथा संस्कृति के द्वन्द्व को प्रदर्शित करती है. “उस दिन आसमान में कितने रंग थे” * वैवाहिक जीवन की विडम्बना और त्रासदी को चित्रित करती चलती है. उनकी कहानियाँ एक विशाल फ़लक पर मानवीय मूल्यों का साक्षात्कार कराती हैं. उनका कथा परिवेश कहानी समाप्त होने के काफ़ी बाद तक पाठक के साथ रहता है. पाठक पात्रों के साथ विचरण करता रहता है, उनसे संवाद करता रहता है. अचला शर्मा एक इंटरव्यू के दौरान कहती हैं, “जीवन का कौन सा अनुभव है जो अपना नहीं है. जो मैंने जीया वह तो निज का है ही. जो जीवन कोई दूसरा जीता है, वह भी उस वक्त मेरा, निज का हो जाता है जब मैं लेखक के रूप में उसे जीती हूँ. कहने का मतलब यह है कि हम जिस परिवेश में सांस लेते हैं, जिन लोगों से मिलते हैं या वे जो हमारे जीवन को दूर से अपनी परछाई से छूकर निकल जाते हैं, वे सभी हमारे निज की जीवन परिधि में आ जाते हैं. इस नाते मैं यही समझती हूँ कि मेरी प्रेरणा का स्रोत मेरे आसपास का परिवेश, उसमें जीते, सांस लेते पात्र और उनके साथ मेरा संपर्क रहे हैं.” लंदन के परिवेश में रह रही कहानीकार का अनुभव व्यापक है. उनके अनुभव क्षेत्र में भारतीय, पाकिस्तानी, अरब, स्कॉटिश, ब्रिटिश सब आते हैं. ये उनकी रचना के प्रेरणा स्रोत हैं.

पड़ोसी पाकिस्तान से हमारे राजनैतिक रिश्ते चाहे जैसे भी हों साहित्यिक और मानवीय रिश्ते काफ़ी मजबूत रहे हैं. प्रवास में ये रिश्ते और भी ज्यादा करीब आ जाते हैं. इसीलिए अचला शर्मा की कहानियों में हमें कभी महरे मिलता है. कभी ट्रेन में मुस्लिम युवक दीखता है. इनकी कहानियों में प्रवासी देश के सरोकार दिखाई देते हैं. लंदन का माहौल, स्थितियाँ, सभ्यता-संस्कृति स्वाभाविक रूप से उनकी कहानियों में आती हैं. आज के भूमंडलीकरण और आतंकवाद के दौर का लंदन उनके जीवन की सच्चाई है और वह पूरी शिद्दत से उनकी रचनाओं में आता है. भारत आता है मगर मात्र गृहातुरता के रूप में नहीं आता है. हाँ गृहातुरता को लेकर “बेघर” जैसी कहानी भी उन्होंने लिखी है. अंडरग्राउंड रेल में विस्फ़ोट के अगले दिन के सहमे संकुचे माहौल का चित्रण “रेसिस्ट” इतना स्वाभाविक बन पड़ा है कि पाठक उस तनाव को शिद्दत के साथ अनुभव करता है. स्थिति इतनी भयावह है कि पुलिस किसी को भी पूछताछ के नाम पर उठा कर ले जा सकती है.
कहानियाँ हमें प्रवासी समाज, परिवेश से रू ब रू कराती हैं, प्रवासी जीवन से परिचित कराती हैं. गैरकानूनी तरीके से किसी देश में प्रवेश करने वालों और वहाँ रह रहे लोगों के अहसास बहुत खूबी के साथ बारीकी से बुनती हैं. अहसास बोलते हुए सुने जा सकते हैं. “मेहर चंद की दुआ” का पहला अनुच्छेद उसके दोनों नामों के साथ उसकी दिक्कत, पहचान के संकट, देश, धर्म, भाषा बोली से पाठक को परिचित करा देता है. एशिया के लोग मेहनती हैं. खासकर भारत और पाकिस्तान के लोग. पर हालात ऐसे हैं कि अपने देश में मेहनत करके भी जीवन की भौतिक खुशहाली प्राप्त नहीं की जा सकती है. आज का प्रवासी अपना देश छोड़कर बेहतर जीवन की तलाश में इंग्लैंड जाता है. वहाँ मेहनत से अच्छी आमदनी हो सकती है. होती है. मेहर बाल काट कर भी इस स्थिति में है कि स्वास्थ्य बनाने के लिए जिम जा सकता है. फ़्लैट में रह सकता है. अपनी बीवी को हर महीने बच्चों की परवरिश के लिए अच्छी खासी रकम अपने मूल देश भेज सकता है.

गर्भनाल ४८ में अपने साक्षात्कार में वे कहती हैं, “एहसास तो वही होते हैं जो लेखक में अपने अनुभवों, सामाजिक सरोकारों और बदलावों से पैदा होते हैं. बस ये एहसास अलग अलग विधाओं में पानी की तरह ढल कर अलग अलग शक्ल अख्तियार कर लेते हैं. अपने आसपास के समाज और पात्रों को समझने और उन्हें उनके परिवेश में, उनकी परिस्थितियों में रखकर उनकी तमाम खूबियों और खामियों के साथ, उनके साथ न्याय कर पाना, हर लेखक के लिए पहली और आखिरी अनिवार्यता है.” इस पहली और आखिरी अनिवार्यता पर वे खरी उतरती हैं.

अचला शर्मा अपने रेडियो नाटकों के लिए अधिक जानी जाती हैं. सुधीश पचौरी उनके नाटकों पर लिखते हुए कहते है, “एक खुला खुला ग्लोबल नजरिया, एक सख्त किस्म की मानवीयता, गहन संवेदनशीलता, जीवन के मार्मिक प्रसंगों की गहरी पहचान, बदलते समय की अनंत जटिलताओं के भीतर प्रवेश कर उनकी परतों को खोलना, प्रवास, प्रवासी अस्तित्व और जीवंत जगत के मानवीय दानवीय मूल्यों को पहल दर पहल खोलते जाने वाली अचला को इन नाटकों के जरिए इस लेखक ने एक बार फ़िर जाना है.” मगर यही खुला खुला ग्लोबल नजरिया, एक सख्त किस्म की मानवीयता, गहन संवेदनशीलता, जीवन के मार्मिक प्रसंगों की गहरी पहचान, बदलते समय की अंनत जटिलताओं के भीतर प्रवेश कर उनकी परतें खोलना, प्रवास, प्रवासी अस्तित्व और जीवंत जगत के मानवीय दानवीय मूल्यों को पहल दर पहल खोलते जाना उनकी कहानियों की भी विशेषता है. जिनके द्वारा उनको जाना जा सकता है. इस लेख में यही प्रयास किया गया है.

वे अपनी रचना प्रक्रिया के संदर्भ में कहती हैं, “प्रवासी के इस जटिल संसार के अलावा मेरी नजर बदलते भारत पर भी रही है. प्रवास ने भारत को ग्लोबल परिप्रेक्ष्य में देखने और जानने की समझ दी.” इसीलिए “बेघर” में वे लिख सकी हैं, “तनख्वाहें बढ़ गई हैं तो महँगाई भी बढ़ गई है. स्कूटरों की जगह कारों की तादाद बढ़ गई है तो सड़कों पर ट्रैफ़िक भी बढ़ गया है; एक्सीडेण्ट बढ़ गए हैं. टेलीविजन पर आने वाले रंगीन विज्ञापनों ने लोगों की इच्छाओं और विकल्पों को बढ़ाया है तो भ्रष्टाचार और अपराध भी बढ़ गए हैं.” अचला शर्मा कहती हैं, “हम जैसे लोग, जहाँ बसते हैं, वहाँ एक ग्लोबल व्यवस्था, वैश्विक सोच और बहु सांस्कृतिक समाज के दरवाजे हमारे लिए खुले हैं. यह हमारी ताकत है.” बीबीसी के हिन्दी विभाग की पूर्व अध्यक्ष, कथा यूके की उपाध्यक्ष, “जड़ें” तथा “पासपोर्ट” रेडियो नाटक, “बरदाश्त बाहर”, “सूखा हुआ समुद्र”, “मध्यांतर” कहानी संग्रहों की रचनाकार अचला शर्मा को विश्व हिन्दी सम्मेलन सूरीनाम में विश्व हिन्दी सेवा के लिए सम्मानित किया गया है. साथ ही उन्हें यूके का पद्मानन्द साहित्य सम्मान भी प्राप्त हुआ है. बीबीसी के पहले उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो में पाँच साल काम किया, वॉयस ऑफ़ अमेरिका में भी उनका डेढ़ साल का अनुभव है. बीबीसी से वे दो दशक से अधिक समय जुड़ी रहीं. लंदन का बहु सांस्कृतिक समाज उनके लेखन की ताकत है. इसी ताकत के बल पर उन्होंने “चौथी ऋतु”, “रेसिस्ट”, “मेहरचन्द की दुआ”, “उस दिन आसमान में कितने रंग थे” और “दिल में इक कस्बा” जैसी कहानियों की निर्मिति की है.

उनके अनुसार, “लेखक के रूप में हमारा कुछ दायित्व भी है. हम अपने समय और परिवेश की अवहेलना नहीं कर सकते हैं. हमारे आसपास पात्रों का, नई समस्याओं का, नए संघर्षों का और नई सोच का विशाल संसार है. उससे जुड़ाव हमारे रचना संसार को नए आयाम दे सकता है.” इसी दायित्व को निभाते हुए उन्होंने रेसिस्ट जैसी कहानी लिखी. इसीलिए वे गैर कानूनी तरीके से लंदन में रह रहे महरेआलम के दर्द को समझ सकीं हैं. नई सोच के तहत महरेआलम और नैन को एक छत के नीचे ला सकीं. दो जरूरतमन्द लोग कैसे मिलकर अपनी समस्याओं का हल खोज सकते हैं और कैसे एक दूसरे का सहारा बन सकते हैं यह समझने के लिए यह कहानी पढ़नी होगी.

मात्र दो पात्रों की सहायता से अचला शर्मा ने कहानी “दिल में इक कस्बा” रची है. माँ प्रभा बनर्जी तथा बेटी नेहा. कहानी माँ के अंतरद्वन्द्व को लेकर आगे बढ़ती है. प्रभा शादी के बाद से समायोजन करती आ रही है. जीवन की खुशहाली, सुख शान्ति के लिए समायोजन अत्यावश्यक है. मगर किस कीमत पर? इस पर बाद में. प्रभा ने यू पी की होते हुए एक बंगाली ब्राह्मण शोमेन से प्रेम विवाह किया और अब वे लोग लंदन में रह रहे हैं. शोमेन अच्छे पद पर, शान्त स्वभाव के व्यक्ति हैं. अक्सर देश-विदेश के दौरे पर रहते हैं. बेटी नेहा प्रवास में जन्मी है. प्रभा की कोशिश रही है कि बेटी को वहीं के माहौल के अनुसार पाला-पोसा जाए. इसके लिए वह स्वयं को बदलने का प्रयास करती है. बेटी की परवरिश के लिए बाहर काम करना बन्द कर देती है. बेटी को किसी तरह की हीन भावना का अनुभव न हो इसलिए प्रभा कार चलाना सीखती है जिससे उसके व्यक्तित्व का विकास होता है. बेटी को प्राइवेट स्कूल भेजती है हालाँकि इस खर्च के लिए उसे अपने अन्य मदों में कुछ कटौती करनी पड़ती है. बेटी पढ़ने में अच्छी है और एक-एक क्लास फ़ंलागती हुई कॉलेज पहुँच जाती है. यहाँ तक तो सब ठीकठाक है. मगर बेटी की युवा होते ही प्रभा के मन में तमाम शंकाएँ सिर उठाने लगती हैं. उसके भारतीय संस्कार उसे चैन से नहीं बैठने देते हैं. वह बेटी को लेकर चिन्तित रहने लगती है. पहले उसे भय है कहीं नेहा लड़कों के साथ न रहने लगे. बाद में जब काफ़ी दिन बीत जाते हैं और कोई ऐसी सुनगुन नेहा की ओर से नहीं होती है. नेहा कॉलेज समाप्त कर एक अच्छे पद पर काम करने लगती है तब उसे चिन्ता होने लगती है कहीं नेहा समलैंगिक तो नहीं है. वह मन कड़ा करके, अपने संकोच को दबा कर, एक दिन बेटी से पूछ ही लेती है और यह जानकर उसे बहुत राहत मिलती है कि ऐसा कुछ नहीं है. मगर प्रभा के भारतीय संस्कारी मन को अभी भी चैन नहीं है.

बेटी तुनकमिजाज है. अब वह बालिग है. अत: प्रभा उससे कुछ भी पूछने से पहले हजार बार सोचती है. तौलती है. उसे डर है कि यदि उसकी किसी बात से नेहा गुस्सा हो गई और उसने उन लोगों से नाता तोड़ लिया तो वह उसके बिना कैसे रहेगी. मगर अपने दिल का क्या करे? बेटी तीस पार कर गई है. उसके लिए कैरियर प्रमुख है. नेहा के लिए सैटल होने क अर्थ कैरियर है जबकि प्रभा की दृष्टि में लड़की के सैटल होना का मतलब उसकी शादी है और नेहा इस बारे में बात करने को राजी नहीं है. हाँ वह माँ को बता चुकी है कि वह लड़कों के साथ रहती-सोती है. प्रभा के भीतर बैठी भारतीय माँ इस कडुवे सच को भी किसी तरह पचा लेती है. मगर उसे चैन नहीं है. और प्रभा इस हद तक समझौता करने को तैयार हो जाती है कि यदि नेहा को कोई गोरा या काला लड़का भा जाए तो वह उसे भी दामाद के रूप में स्वीकार कर लेगी. मगर नेहा की जीवन पद्धति उसकी समझ के बाहर है.

पिता शोमेन पत्नी-बेटी के जीवन में बहुत दखल नहीं देते हैं वे अक्सर बेटी का पक्ष लेते हैं, प्रभा को सलाह देते हैं, “छेड़े दाओ ओके” लेकिन एक समय आता है जब उनका धैर्य चुक जाता है. नेहा काफ़ी दिनों से एक स्कॉटिश लड़के मार्टिन के साथ रह रही है और अब गर्भवती भी है. शोमेन कह उठते हैं, “प्रोश्नो ई ओठे ना.” “साथ रहना है तो शादी करने में क्या समस्या है. कह दो उसे, मुझे यह लिविंग टुगैदर का कल्चर बिल्कुल पसंद नहीं है.” असल में उन्हें चिन्ता है कि यदि “इंडिया में किसी घर वाले को पता चल गया तो क्या जवाब देंगे.” नेहा का कहना है, “यहाँ के इंडियन लड़कों के साथ बड़ी समस्या है माँ खुद तो इस सदी में रहना चाहते हैं और बीवी को पिछली सदी में रखना चाहते हैं.” उसे डर है कि कहीं उसके माता पिता उसके लिए भारत से लड़का इम्पोर्ट न कर लें. यह भी प्रवास का एक चलन है. भारत के लड़के भी विदेश में बसने के लिए ऐसे मौकों की तलाश में रहते हैं.

नेहा जिन्दगी अपनी पसन्द से जीती है लेकिन कहानी के अन्त में सारा दोष माँ पर डाल देती है, “माँ, आपकी स्मॉलटाउन मेंटिलिटी की वजह से मार्टिन क्या, कोई लड़का मेरी जिन्दगी में नहीं टिकेगा.” इससे नेहा के स्वभाव का पता चलता है. मतलब पर माँ को याद करती है और तो और माँ को जब तब इमोशनल ब्लैकमेल भी करती है. कभी गले में बाँहें डाल कर अपनी बात मनवाती है, कभी पैर पटकती हुई घर से निकल जाती है. कभी उससे मनपसंद खाने की फ़रमाइश करती है.
आज के मनुष्य की विडम्बना है कि वह सुख सुविधाओं के बीच भी तनावपूर्ण जीवन जीता है. सारा वातावरण तनावपूर्ण है मानो किसी ज्वालामुखी पर बैठा है. किसी भी समय फ़ट पड़ने को आतुर. वह वातावरण प्रवासी हो, अपने देश का हो अथवा घर के भीतर का हो. तनाव की संभावना हर जगह बनी हुई है. घर के भीतर रिश्तों में तनाव है. पति पत्नी के आपसी संबंधों में तनाव अनोखी बात नहीं है. माता-पिता और बच्चों के बीच तनाव आज आम बात है. बाहर किसी अजनबी, किसी अन्य नस्ल अथवा अन्य धर्म वाले को देखते ही हमारे भीतर तनाव उत्पन्न हो जाता है. कहानी एक सूक्ष्म कला है. शब्दों के माध्यम से कहानी में तनाव की अभिव्यक्ति एक खास तरह की प्रौढ़ता की माँग करती है. अचला शर्मा शब्दों और शब्दचित्रों के माध्यम से समय और वातावरण तथा रिश्तों के तनाव का सशक्त चित्रण करती हैं. “रेसिस्ट” में ट्रेन के डिब्बे में धीरे-धीरे जो तनाव उत्पन्न होता है वह पुलिस वालों की उपस्थिति से और भी सघन हो जाता है. पिछले दिन लंदन के अन्डरग्राउण्ड रेलवे में पाकिस्तान के आतंकवादियों ने बम विस्फ़ोट किया है, आज सारे अखबार, टीवी उसी हादसे के खबरों और चित्रों से भरे हुए हैं. मगर कोई कुछ नहीं बोल रहा है. वैसे भी ब्रिटेन के लोग चुप रहते हैं. मगर आज की चुप्पी तनाव के कारण है स्वभावगत विशेषता के कारण नहीं. लोग जबरदस्ती अखबार में सिर घुसाए हुए हैं. “आज की खामोशी में कल की दहशत घुल गई है.” सबके मन में भय है, “जो कल हुआ वह आज भी हो सकता है.” और तभी उसकी दृष्टि एक लड़की पर पडती है, तनाव बढ़ जाता है, “लड़की सर पर स्कार्फ़ बांधे है. मुसलमान है, यह निश्चित है. मगर कहाँ की है यह कहना मुश्किल है.” अंग्रेज को रेसिस्ट कहना समझना आसान है पर क्या हम भी उसी मानसिकता से ग्रस्त नहीं हैं?

लड़की की सीट के पास एक लड़का खड़ा है. “चेहरे पर हल्की सी दाढ़ी है. पाकिस्तानी हो सकता है, या फ़िर अरब.” मगर लडके का चेहरा जाना-पहचाना लग रहा है. लड़का भी उससे यही बात कहता है. मगर आज किसी मुसलमान को पहचाना खतरे को बुलावा देना हो सकता है.

तनाव तब और बढ़ जाता है जब गाड़ी काफ़ी देर के लिए रुक जाती है. तरह तरह की आशंकाएँ घेरने लगती हैं. “कहीं इस डिब्बे में कोई बम तो नहीं. इन यात्रियों में कोई टेरेरिस्ट तो नहीं बैठा...उसने झुकी नजर से बाकी यात्रियों के बैगों का मुआयना शुरु कर दिया, कौन सा मोटा है, कौन सा बैक पैक, कहीं कोई अपना सामान गाड़ी में छोड़ कर उतर तो नहीं गया...” पुलिस की उपस्थिति से वातावरण और तनावपूर्ण हो जाता है. तब माहौल और भी दहशतभरा हो जाता है जब दो पुलिस वाले इसी डिब्बे में सवार हो जाते हैं. इतना ही नहीं, “दोनों पुलिस वाले, जो अब तक दरवाजे के पास खड़े थे, डिब्बे में चक्कर लगाने लगे हैं.” गाड़ी चलने पर लोग राहत की सांस लेते हैं. मगर अगली बार गाड़ी सुरंग में रुक जाती है. तनाव ही तनाव. तनाव से सांस लेना मुश्किल हो रहा है. तनाव से दम घुट रहा है.

इस समय तक कथावाचिका ने उस दाढ़ी वाले लड़के को गैरकानूनी काम में लिप्त सोच लिया है. “क्या मालूम क्या एजेंडा है इसका.” और पुलिस वाले भी उसी लड़के के पीछे पड़ते हैं. स्थिति इतनी असह्य हो जाती है कि वह सोचती है, “बस पकड़ लेगी मगर इस तनाव को और नहीं झेलेगी.” तनाव का ऐसा चित्रण प्रवासी हिन्दी कहानी में बेजोड़ है.

पुलिस उस दाढ़ी वाले युवक को पूछताछ के लिए ले कर उतर जाती है. कथावाचिका को याद आ जाता है कि स्पोकन इंग्लिश के कोर्स में सबसे कम उम्र का छात्र यही तो था. मगर जब पुलिस उससे पूछती है कि क्या वह लड़के को जानती है तो वह साफ़ इन्कार कर देती है. जबकि उसे उसका नाम भी याद आ जाता है. उसे अजीब लगता है कि उससे लड़के के बारे में क्यों पूछा जा रहा है. वह साफ़ मुकरते हुए कहती है कि मैंने इसे अपनी जिन्दगी में पहले कभी नहीं देखा है. “उसने चीखती सी आवाज में अपनी आपत्ति जताई ताकि हर यात्री तक उसकी आवाज पहुँच जाए.”

उसे मन में सकून है कि उसने उस लड़के से ज्यादा बात नहीं की. हर बार पहले से तेज आवाज में वह नटती है, कहती है, “आई डू नॉट नो हिम.” “नहीं ऑफ़ीसर मैं उसे बिल्कुल नहीं जानती, जिन्दगी में इससे पहले कभी मिली भी नहीं.” कितनी आसानी से कह दिया उसने.

इस कहानी के अन्त और “जीसेस के लास्ट सपर” में काफ़ी समानता है. लास्ट सपर के समय पीटर जीसेस के लिए कुछ भी करने के लिए यहाँ तक कि जान भी देने का दावा कर रहा है मगर जीसेस स्पष्ट कह देते हैं कि सुबह मुर्गे के बोलने के पहले पीटर जीसेस को पहचानने से तीन बार इन्कार कर चुका होगा. और यही होता है तीन बार पीटर से पूछा जाता है क्या वह जीसेस को जानता है? हर बार पहले से ज्यादा जोर से वह कहता है कि वह जीसेस को नहीं जानता है. वक्त पड़ने पर हम कितने स्वार्थी हो जाते हैं, यह प्रवासी ही नहीं हर आम आदमी का यथार्थ है. मगर कहानी में इस यथार्थ का सामना करके वह निरपेक्ष नहीं है. उसे अपनी घिनौनी सच्चाई दीख जाती है. जो बदबू पहले केवल एक स्त्री से आ रही है और वह स्त्री अब डिब्बे में नहीं है फ़िर भी बदबू पूरे डिब्बे में फ़ैल चुकी है. अचला शर्मा की कहानियाँ हमारी सारी इन्द्रियों को सम्बोधित करती हैं. इन कहानियों में चाक्षुक संवेदना के साथ-साथ घ्राण, स्पर्श और श्रवण संवेदना भी परिलक्षित होती है.

इस कहानी में नए-नए प्रवासी की मानसिकता और धीरे-धीरे उसका नए परिवेश में समाहित होते जाना और अपने को कुछ विशिष्ट समझने लगने का बड़ा सटीक वर्णन है. शुरु में होमसिकनेस के कारण उसे देशवासी का संग-साथ सकून देता है. फ़िर साल भर में वह खुद को उनसे दूर करने लगता है. उसे उनकी उपस्थिति से शर्मिन्दगी अनुभव होने लगती है. उनकी गंध तक उसे असह्य होने लगती है. देश से आए लोगों का इंग्लिश का अज्ञान उसमें खीज उत्पन्न करता है. भारतीयों की खासी संख्या लंदन में है. डिब्बे में भी तीन चौथाई एशियन हैं. मगर उसे अन्य देश के लोगों का थोक के भाव आना और लंदन में बसना नहीं जँचता है. “उसे यह बात बहुत बुरी लगती है कि कोई उसे गुजराती समझ ले. कोई मजाक है? उसे यह बात उतनी ही बुरी लगती है जितनी कि यह कि कोई उसे पाकिस्तानी समझ ले.” वह अपनी पोशाक भी बदल लेता है और एक समय ऐसा आता है जब वह अपने स्वार्थ, खुद को खतरों से बचाए रखने के लिए अपने जैसों को पहचानने से भी इंकार कर देता है. उनकी उपस्थिति उसमें तनाव उत्पन्न करती है.

तनाव “दिल में इस कस्बा” में भी है मगर यह आतंकवाद, पुलिस, सत्ता का तनाव नहीं है. यह आपसी, पारिवारिक संबंधों का तनाव है. प्रभा और नेहा के संबंध कभी भी नॉर्मल नहीं हैं. प्रभा को बोलते समय सदैव ध्यान रखना पड़ता है कि कहीं वह बेटी को खो न दे. बेटी भी माँ की प्रश्न पूछने, उसकी निजी जिन्दगी में झाँकने की आदत से तनाव में रहती है. बात- बात में चाहे वह प्रभा का घर हो अथवा नेहा का फ़्लैट वातावरण तनावपूर्ण हो उठता है. हर बार हार कर प्रभा चुप हो जाती है. दोनों के बीच कुछ दिन के लिए संवाद का पुल बंद हो जाता है. यहाँ आर्थिक दबाव नहीं है. दो पीढ़ियों की सोच, दो संस्कृतियों का द्वन्द्व तनाव उत्पन्न करता है. संस्कृतियों की टकराहट और जेनेरेशन गैप के कारण तनाव है.

संस्कृतियों का सदैव सम्मिश्रण होता है. विवेकशील प्रवासी मूल देश और प्रवास की सांस्कृतिक टकराहट से नहीं बच सकता है न ही प्रवास की संस्कृति से अछूता रह सकता है. विवेकपूर्ण प्रवासी दोनों संस्कृतियों से विशेषताएँ ग्रहण करता है. दोनों की कमियों से दूर रहने का प्रयास करता है. बुराइयों को दूर करने की कोशिश करता है. प्रभा ने दोनों संस्कृतियों की सकारात्मक बातें अपना ली हैं, वह एक विवेकशील परन्तु भावुक स्त्री है. उसकी समस्या है कि उसने बेटी को अपने जीवन की धूरी बना लिया है. उसका अपना निजी जीवन है ही नहीं. बेटी को प्रेम करना ठीक है मगर पैंतीस साल की लड़की के लिए अपनी जिन्दगी लगा देना अपने जीवन के साथ अन्याय है. उसके तनाव का एक कारण यह भी है.

तनाव का निर्माण कहानीकार “उस दिन आसमान में कितने रंग थे” में भी करती हैं. यह परिस्थितियों की माँग है कि अभिनव शारीरिक तनाव उत्पन्न करे. मगर क्या सोच-समझ कर तनाव उत्पन्न करना इतना सरल है? कहानी की शुरुआत में अभिनव अस्पताल के कमरे में अकेला है. उसे शारीरिक तनाव की आवश्यकता है मगर वह मानसिक तनाव में है. उसे डॉक्टर के निर्देशानुसार काम करना है. क्या जज्बात ऐसे किसी के आदेश पर चलते हैं? कमरे में पुरुष को उत्तेजित करने की बहुत सारी सामग्री जैसे नंगी औरतों की तस्वीरों वाली पत्रिकाएँ, डीवीडी पर उत्तेजक फ़िल्में आदि उपलब्ध हैं. मानसिक तनाव अभिनव को अपने बीते दिनों में ले जाता है. वह अपनी पत्नी को बहुत प्यार करता है पर अपने पहले प्रेम शाजिया को नहीं भूल पाया है. इसको लेकर उसके मन में कहीं कोई अपराधबोध नहीं है. है तो केवल एक कसक. जब शाजिया उससे अलग हुई थी, उस दिन की स्मृति उसे सदा सालती रहती है. दस साल हो गए हैं अभिनव और रूपाली की शादी को और अभी तक वे बेऔलाद हैं. बच्चे की उम्मीद लगाए रूपाली और उसके संबंधों में तनाव आ चुका है. अब हालात ये हैं कि, “एक लंबे अरसे से रूपाली की माँ बनने की ख्वाहिश, उसकी हताशा, उसका तनाव – सब के सब बिस्तर में आकर उनके बीच लेट जाते हैं.” इस कहानी में अचला शर्मा जीवन के मार्मिक प्रसंगों को उठाती हैं.

अभिनव और रूपाली के वैवाहिक जीवन में आवेग और उत्तेजना समाप्त हो चुकी है. अब जब वे आई वी एफ़ के इलाज की शरण में आए हैं तब भी कम तनाव नहीं है. “अभिनव ने कहीं पढ़ा था कि आई वी एफ़ के इलाज के दौरान तनाव इतना बढ़ जाता है कि कुछ दम्पति नजदीक आने के बजाए एक दूसरे से दूर चले जाते हैं, संबंध टूटने के कगार पर आ जाते हैं.” लेकिन अभी उनके संबंध इतने नहीं बिगड़े हैं. जब पत्नी के प्रेम के साथ उससे सटती है तो वह उत्तेजित हो उठता है. रूपाली “उससे सट गई, कुछ ऐसी नर्मी और गर्माहट के साथ कि उस वक्त अभिनव को अपनी जाँघों के बीच तनाव महसूस होने लगा.”

जब शाजिया मेरी स्टॉपस क्लीनिक में थी तब भी कहानी पढ़ते हुए पाठक अभिनव के तनाव को अनुभव कर सकता है. “जितनी देर शाजिया अंदर रही वह घबराया हुआ सा छोटे से वेटिंग रूम में चक्कर लगाता रहा. पसीने की वजह से उसका मेक अप बहने लगा था पर इस वक्त उसे पकड़े जाने की भी फ़िक्र नहीं थी. फ़िक्र थी तो शाजिया की. कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए.”

इन कहानियों की संवेदनाएँ, प्रतिक्रियाएँ और व्यवहार पाठक को तादात्म का धरातल देते हैं. वे कहती भी हैं, “लेखक, समाज और पाठक का संबंध जितना सहज और स्वाभाविक है, उतना ही जटिल भी. लेखक, समाज और पाठक एक त्रिकोण के तीन बिन्दु हैं एक दूसरे से जुड़े हुए और विलग भी. लेखक समाज की उपज है और पाठक भी. और इन दोनों से मिलकर समाज बनता है. लेखक अपनी कविता, कहानियों, उपन्यासों और नाटकों के लिए इसी समाज से अनुभव ग्रहण करता है, पात्रों और घटनाओं से प्रेरित होता है और उनकी कहानी अपने शब्दों में उन्हीं के सामने पेश करता है.” सच में ये कहानियाँ हमारी अपनी कहानियाँ हैं. हमारे समय की कहानियाँ हैं. अचला शर्मा ने अपने परिवेश से अनुभव ग्रहण किए हैं वहीं से पात्र और घटनाएँ ली हैं और पाठकों के समक्ष उसी की कहानी को अपने शब्दों में सजा कर प्रस्तुत कर दिया है.

जीवाश्म के खोल में जैसे जीव की संपूर्ण छाप होती है वैसे ही रचना पर रचनाकार की छाप होती है. खोल के भीतर जैसे जीव था वैसे ही साहित्य के पीछे व्यक्ति होता है. रचनाकार पर जिन कारकों का प्रभाव है उनको जाने बिना रचना को नहीं जाना-समझा जा सकता है. साहित्य मात्र कल्पना नहीं है. नस्ल, संस्कृति और इतिहास ये प्रमुख कारक हैं. यही कारक अचला शर्मा की हिन्दी प्रवासी कहानियों में प्रभा को नेहा की जीवन पद्धति गले नहीं उतारने देते हैं. बंगाली पति शान्त स्वभाव का है पत्नी के कामकाज में ज्यादा दखल नहीं देता है. पाकी कह कर सम्बोधित करने वाले उसे रेसिस्ट लगते हैं. मुसीबत में पड़े एक मुस्लिम युवक को पहचानने से इन्कार करने का कारण भी यही कारक हैं. माँ बन कर जीवन की सार्थकता मानना भी इसी का हिस्सा है. नवीन भाई की बदौलत महरेआलम की नौकरी है और वे महरेआलम से बड़ी मुहब्बत करते हैं. भारत के फ़रीद भाई महरे की सहायता करते हैं. महरेआलम नंदिनी को अपना फ़्लैट शेयार करने देता है और नैन के हाथ के जायके के वह कई कई दिन तक गोश्त नहीं खाता है. नैन का लिहाज करके घर पर गोश्त नहीं बनाता है, बाजार में जाकर खा लेता है. हर कहानी अचला शर्मा के व्यक्तित्व की छाप लिए हुए है.

छोटे-छोटे सुख जिंदगी को मुकम्मल बनाते हैं. संवेदना की पराकाष्ठा है, “जिन्दगी में पहली बार उसने किसी औरत को ऐसे गले लगाया था. लाहौर में अपनी बीवी के साथ रिश्ता सिर्फ़ बिस्तर का था जिसका नतीजा था वो चार बच्चे. औरत को सिर्फ़ गले लगाकर भी कितना सकून मिल सकता है, यह महरेआलम ने पहली बार जाना.” इसीलिए सब भूल कर “उसने बस लेटे लेटे दुआ में हाथ उठाए – ’अल्लाह मियाँ, लिब्रल डेमोक्रेट जीतें या हारें, सरकार में आएँ चाहे न आएँ, मुझे लीगल स्टेटस मिले या न मिले, मैं तेरे रहमोकरम से जैसा हूँ बहुत खुश हूँ. ऐ मेरे अल्लाह, मुझ गुनहगार बंदे पर यह करम फ़रमाता रह. आमीन सुम्मा आमीन!” स्त्री-पुरुष संबंधों पर इतनी संवेदनशील कहानियाँ कम ही पढ़ने को मिलती हैं. दानवीय समय के बरबक्स ऐसी मानवीय कहानी समाज को एक नई सकारात्मक दृष्टि से परिचित कराती है.

अचला शर्मा अपनी कहानियों में इंग्लिश के अलावा विभिन्न भारतीय भाषाओं की छौंक यथास्थान लगाती चलती हैं. कहीं गुजराती, कहीं बांग्ला तो कहीं उर्दू की खुशबू उनकी कहानियों से आती है. अपनी कहानियों में वे जगह-जगह सूत्र वाक्य भी टाँकती चलती हैं, जैसे “मुनाफ़ा तो उसी काम में है जो काम आता हो.” “औरत को सिर्फ़ गले लगाकर भी कितना सकून मिल सकता है.” (मेहरचन्द की दुआ), “लंदन की अंडरग्राउंड गाड़ियों में बोलने का रिवाज़ है भी नहीं.” (रेसिस्ट),
एक साक्षात्कार में अचला शर्मा कहती हैं, “एक बात का श्रेय मेरे रेडियो के अनुभव को निश्चित रूप से जाता है कि नाटक हो या कहानी, अथवा आलोचनात्मक टिप्पणी, मेरे वाक्य छोटे होते हैं और भाषा सहज.” सहज सरल भाषा में अपनी बात कहनी अचला शर्मा को आती है. यह कार्य आसान नहीं है. वे बहुस्तरीय यथार्थ को सहज सरल शब्दों में चित्रित करने में सक्षम हैं जैसा कि उनकी कहानी “रेसिस्ट” में हुआ है.

अक्सर लोग लिखने की शुरुआत कविताओं से करते हैं मगर अचला शर्मा कहती हैं, “लिखने की शुरुआत मैंने कहानी लेखन से की थी और अब फ़िर से कहानियाँ लिख रही हूँ.” अचला शर्मा का कहानियों की ओर लौटना हिन्दी कथा साहित्य के लिए शुभ है. वे एक विशिष्ट अपरिचित भावभूमि से पाठकों को परिचित कराती हैं. इनकी कहानियाँ पाठक को एक सक्रिय भागीदारी के लिए आमंत्रित करती हैं. भविष्य में पाठकों को उनसे इसी विशिष्ट भावभूमि की बहुस्तरीय यथार्थ को प्रस्तुत करने वाली ढ़ेरों कहानियों की अपेक्षाएँ हैं.
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*कई कहानियाँ अचला शर्मा के सौजन्य से पाण्डुलिपि के रूप में प्राप्त हुई हैं क्योंकि अब संग्रह की प्रतियाँ उपलब्ध नहीं हैं.